जरबेरा की खेतीः अपार संभावनाओ के साथ नई खोज, 36 महिने तक मिलेगा उत्पादन

रायपुर। प्रदेश में जरबेरा फूल की खेती की संभावनाएं तलाशी जा रहीं हैं। प्रोटेक्टिव टेंप्रेचर के कड़े मापदंड में अब तक केवल सरगुजा के मैनपाट का इलाका ही खरा उतरता नजर आता है लेकिन वैज्ञानिक कोई खतरा नहीं उठाना चाहते, इसलिए इस क्षेत्र के पूरे साल के तापमान का अध्ययन किए जाने की खबर है।

क्या आप जानते हैं कि भरपूर कीमत देने वाला जरबेरा के फूलों का एक ही पौधा, चार विभिन्न रंगों वाले फूल देने में सक्षम है ? यह नहीं जानते होंगे कि एक बार के रोपण के बाद, लगातार तीन साल यह पौधा, भरपूर मात्रा में फूल का उत्पादन देता है। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में प्रायोगिक खेती सफल होने के बाद अब वहां व्यावसायिक खेती, बड़े पैमाने पर की जाने लगी है। भरपूर कीमत, भरपूर बाजार वाले इस फूल की खेती अपने छत्तीसगढ़ में हो सकती है या नहीं ? इस पर कृषि वैज्ञानिकों का काम चालू हो चुका है।

इसलिए तलाश संभावना की

फूलों की बढ़ती मांग और व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ता रुझान देखकर कृषि वैज्ञानिकों ने परंपरागत खेती से हटकर, कुछ नया करने की चाह रखने वाले किसानों के लिए जरबेरा के पौधों के रोपण को उपयुक्त माना है। इसमें बेहतर लाभ भी बड़ी वजह है। गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा के अलावा दूसरी कई प्रजातियों के फूलों की मांग की आपूर्ति, पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों से हो रही है। पूरे साल मांग में बने रहने वाले फूलों से भी स्थाई आय को बनाए रखने में सक्षम माना जा चुका है।

इसलिए जरबेरा को प्राथमिकता

जरबेरा की खेती को इसलिए प्राथमिकता दी जा रही है क्योंकि इसकी एक बोनी लगातार 36 महीने तक उत्पादन देती है। उच्च कीमत वाली इस प्रजाति के पौधे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एक साथ चार रंग के फूल खिलते हैं। शादी-ब्याह के अलावा अन्य मांगलिक कार्यक्रम में इसकी खरीदी को पहली प्राथमिकता मिलती है।

ऐसी करें खेती

जरबेरा के पौधों के रोपण का उपयुक्त समय, बसंत त्रतु को माना गया है। रोपण के पूर्व, पूरी तरह समतल भूमि बनानी होगी। पौधे से पौधे की दूरी, 30 से 40 सेंटीमीटर रखना होगा। बेहतर ग्रोथ के लिए गोबर के साथ नारियल का भूसा मिलाकर खाद के रूप में छिड़काव करना होगा। सिंचाई प्रबंधन पर सतत निगरानी के बाद खरपतवार नियंत्रण का काम, फसल के आने तक जरूरी होगा। बोनी के 3 माह बाद कलियां लगनी चालू हो जाती हैं और यह क्रम अगले 36 महीने तक लगातार चलता रहता है।

तापमान अहम शर्त

जरबेरा की खेती के लिए प्रोटेक्टिव टेंप्रेचर का होना बेहद महत्वपूर्ण है। अध्ययन और अनुसंधान में इसके लिए 22 से 25 डिग्री सेल्सियस के तापमान को सही माना गया है। लिहाजा प्रदेश में तलाशी जा रही संभावना में इसे ही ध्यान रखा जा रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक, अब तक की खोज में सरगुजा का मैनपाट क्षेत्र सही लग रहा है लेकिन अंतिम फैसला, पूरे साल की तापमान रिपोर्ट के अध्ययन के बाद लिए जाने के संकेत हैं।

“जरबेरा की खेती के लिए संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इसके लिए प्रोटेक्टिव टेंप्रेचर पहली और अंतिम शर्त है। जब तक यह नहीं मिलेगा, तब तक बेहतर परिणाम नहीं मिलेंगें”।

  • डॉ. टी. तिर्की, असिस्टेंट प्रोफेसर, फ्लोरीकल्चर एंड लैंडस्केप आर्कि., इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर

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