नाली,बिजली, पानी,सड़क लोगों के है मौलिक अधिकार व जिला प्रशासन की प्राथमिकता के कार्य
मुंगेली। वर्ष 2012 जिला मुंगेली निर्माण के बाद लोगो के बसाहट तेजी से शहर के आसपास व कालोनी जैसे भव्य रूप में हुए है। निःसंदेह नई नई कालोनियों में लोगो का रुझान देखा गया और तेजी से लोग प्लाट खरीद घर बना लिए मगर ये देखने लायक बात है कि जितनी भी कालोनियों का विस्तार हुआ है सभी कालोनी के लिए कोई अलग से सरकारी गाइडलाइंस अथवा नियम कायदे नही बल्कि जो शासन के नियम में है वो रहे मगर किसी ने पालन नही किया। सरकार के नियम भी समय समय पर बदलते रहे और लोगो का बसाहट भी बढ़ता गया ऐसे में कुछ शहर के घनी आबादी के कालोनी कहे जाने वाले जैसे शिक्षक नगर,करही के आसपास हो अथवा अन्य कालोनियों में नगर पालिका में लोगों की बसाहट को ध्यान रखते हुए मूलभूत सुविधाओं का विस्तार भी करना शुरू किया। जिससे शहर के आधे कालोनियों में बिजली, पानी, पक्की सीसी रोड,साफ सफाई नगर पालिका का अमला कर रहा है या कहे शासन,प्रशासन की नजर इनके बसाहट अनुसार उपलब्ध कराई जाती रही है। मगर अब देखने वाली बात यह भी है कि सरकार ने जब रजिस्ट्री के लिए सरलीकरण कर छोटे छोटे भूखंडों की आसानी से रजिस्ट्री सहित अनेक जमीन,प्लाट के लिए नियमों को शिथिल कर जिला के विकास के लिए अहम भूमिका निभाई उसके अलावा सरकारी अथवा नजूल की जगहों को भी विक्रय कर राजस्व में वृद्धि सहित लोगो के अतिक्रमण मामले को स्थायी हल के लिए सफल प्रयास किया गया अब ऐसे में लोगो की घनी बसाहट के बावजूद नगर पालिका परिषद अथवा स्थानीय प्रशासन का वहाँ के निवासरत लोगो के लिए मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा जाना निःसंदेह अपने ही लोगो से गैर जिम्मेदार बर्ताव जैसा रवैया देखा जा रहा है जबकि सरकार और प्रशासन की सोंच यह होनी चाहिए जहाँ लोगो की बसाहट कॉलोनी अथवा मोहल्ले के रूप में विकसित होने लगी हो वहां सभी मूलभूत सुविधाओं का प्राथमिकता से उपलब्ध कराना ये सरकार की अहम जिम्मेदारी है।
अवैध प्लाटिंग के बहाने कालोनियों के विकास में न बने कोई रोड़ा
जिला निर्माण के बाद प्रायः यह देखा जा रहा है कि शहर भीतर अवैध कालोनियों के लिए दो वर्ग के लोग है है जिनके द्वारा अपनी जमीनों में अवासीय प्रयोजन से छोटे छोटे प्लाट बेच बसाहट बनाई गई जिसमें एक वर्ग जो कि हर दृष्टिकोण से सक्षम या कहे मिलीभगत से सभी काम को अंजाम देता रहा और दूसरे वे लोग जिनकी पुस्तैनी जमीन तो रही बेचा भी गया मगर प्रशासनिक, राजनैतिक अथवा अन्य सभी को मैनेज करने की कोशिश न कर सीधे लोगो के लिए छोटे छोटे भूखंड विक्रय कर घर बसाहट बनाई गई। ऐसे में सवाल एक यह भी है कि जिन लोगो ने वीरान जगहों में छोटे छोटे आशियाना बना लिए है क्या उन्हें अपना जीवन जीने अधिकार नही? या फिर ये कहे उनके कालोनियों के लिए अवैध कालोनी की बात समय समय पर कुछ विघ्नसंतोषी लोगों द्वारा ही सत्ता अथवा अन्य दम्भ में क्यों हो रही है। कहाँ गई लोगो की इंसानियत? क्यों इनके निजी जीवन पर बार बार रास्ता रोक,बिजली पानी सड़क से वंचित कर कायराना रख अपनाया जाता है। आखिरकार ऐसे लोगो के विरोध के पीछे इनसाइड फैक्ट जिला प्रशासन अथवा जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों द्वारा क्यों नही समझ समाधान का प्रयास किया जाता है।
घनी बसाहट के बाद मूलभूत सुविधाएं देंने का है प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस अनुसार जिस मोहल्ले बस्ती अथवा वीरान क्षेत्र में यदि बसाहट हो रही हो अथवा होने की संभावना दिख रही हो वहां जनप्रतिनिधियों द्वारा यदि ध्यान नही दिया जा रहा हो तब ऐसे परिस्थितियों में उन रहवासियों के मूलभूत सुविधाओं जैसे बिजली, पानी,सड़क,चिकित्सा स्वास्थ्य सेवा के लिए नगर पालिका व जिला प्रशासन उत्तरदायी माना जाता है जहां लोगो को सभी सुविधाएं उपलब्ध कराए। यदि शासन के गाइडलाइंस में कालोनियों का निर्माण न होकर सीधे बसाहट से लोग रहने लगे हो वहां भी विकास की संभावनाएं देखते हुए जनहित में प्रशासनिक प्रस्ताव बिजली, पानी,नाली,सड़क सहित सभी मूलभूत सुविधाओं के लिए किए जाने का प्रावधान है। ताकि आम नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन न हो इसके साथ ही लोग अप्रवासी दर्जें से जीवन यापन न कर आम नागरिक की तरह जीवन बसर करें। बावजूद मुंगेली नगर पालिका में कुछ स्थानो को ही बार बार चिन्हाकित कर अवैध कालोनियों अथवा कुछ लोगों के बेतुके विरोध के चलते रास्ता रोक दिया जा रहा है। अनैतिक रूप से आमजनमानस के सामान्य जीवन जीने से वंचित रखे जाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।
प्रशासन को चाहिए कि सभी रहवासियों के लिए मूलभूत सुविधाएं के हो प्रस्ताव
मुंगेली नगर पालिका अंतर्गत सभी घने बसाहट वाले क्षेत्रों जहां स्कूल,कालेज,स्टेडियम सहित हजारों लोगों की बसाहट हो गई है मगर जीवनयापन बदहाल है उन सभी जगहों के लिए जिला प्रशासन व नगर पालिका की संयुक्त टीम द्वारा आम प्रस्ताव तैयार कर सभी कालोनियों में मूलभूत सुविधाओं जैसे बिजली, पानी,सड़क, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए प्लान किया जाना सुनिश्चित कर शासन से विशेष स्वीकृति प्रस्ताव बनाकर भेजा जाना चाहिए ताकि हर नागरिक को समान अधिकार दर्जे की जिंदगी जीने का अधिकार से कोई भी वंचित न हो।
लोग हो रहे आक्रामक, प्रशासनिक पहल न होने पर लग सकती है हाई कोर्ट में पीआईएल
वर्षो से शहरी क्षेत्र में अपनी पुस्तैनी जमीन अथवा छोटे छोटे भूखंड क्रय कर आशियाना बना लिए जाने वाले लोगो का परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है आम रास्ता प्रभावित करने का जो अधिकार छिन लिया जा रहा है उसके लिए लोगों में जागरूकता देखी जा रही है शीघ्रता से प्रशासनिक पहल न हुई तो इनके स्थायी निवारण के लिए मुंगेली नगर पालिका क्षेत्र अन्तर्गत आजादी के बाद से अब तक लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जीवन जी रहे है अब उन लोगो द्वारा जनहित में याचिका हाई कोर्ट लगाने की तैयारी चल रही हैं जिसके बाद ये सारी सुविधाएं न मिलने पर आम लोगो को सामान्य जीवन जीने के लिए न्यायलयीन शरण से अधिकार लेने का सार्थक प्रयास भी हों सकने की संभावना भी है।

शहर की परिभाषा-
शहर शब्द का तात्पर्य उस क्षेत्र से है जो घनी आबादी वाला है और यहाँ पर मानव निर्मित परिवेश की विशेषताएं होती हैं। ऐसे क्षेत्र में रहने वाले लोग व्यापार, वाणिज्य या सेवाओं में संलग्न होते हैं। इस उपनिवेश में, उच्च स्तर का औद्योगिकीकरण होने की भी संभावना है जिसके परिणामस्वरूप वहाँ रहने वाले लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं। शहरी उपनिवेश केवल शहरों तक ही सीमित नहीं होता है, बल्कि कस्बों और उपनगरों (उपनगरीय क्षेत्रों) को भी इसमें शामिल किया गया है। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को कई लाभ(मूलभूत सुविधाएं) शासन व प्रशासन से अवश्यकतानुसार मिलते हैं जैसे विभिन्न सुविधाओं तक आसानी से पहुंच, बेहतर परिवहन सुविधाएं, मनोरंजन और शिक्षा के विकल्प, सड़क,स्वास्थ्य सुविधाएं आदि। हालांकि यहाँ प्रदूषण जैसी कुछ ख़ामियों को देखा जा सकता है, जो बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण और बसों, ट्रेनों, कारों और परिवहन के साधनों के कारण होता है, इसी वजह से शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि होती है।
ग्रामीण की परिभाषा
हम ‘ग्रामीण’ शब्द को उपनगर में स्थित एक क्षेत्र के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। यह एक छोटे से उपनिवेश को संदर्भित करता है, जो एक शहर, व्यावसायिक या औद्योगिक क्षेत्र की सीमाओं के बाहर होता है। इसमें ऐसे ग्रामीण इलाके, गांवों या बस्तियां शामिल होती हैं, जहाँ प्राकृतिक वनस्पति और खुले स्थान होते हैं। ऐसे क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व कम होता है और यहाँ रहने वालों की आय का प्राथमिक स्रोत कृषि और पशुपालन होता है। कुटीर उद्योग भी यहां आय का एक मुख्य स्रोत भी बनाते हैं। भारत में, एक शहर जिसकी जनसंख्या 15000 से कम है, को नियोजन आयोग के अनुसार, ग्रामीण माना जाता है। ऐसे क्षेत्रों की देखभाल के लिए ग्राम पंचायत उत्तरदायी होती है। इसके अलावा, यहाँ कोई नगरपालिका नहीं होता है।

लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और विकास कार्यों से लाभान्वित करना हमारी प्राथमिकता: मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया
नगरीय प्रशासन एवं विकास तथा श्रम मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया ने कहा कि जनहित को देखते हुए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट निर्माण, विभिन्न वार्डों में सीसी रोड़ एवं नाली निर्माण कार्य तथा पौनी पसारी योजना अंतर्गत बाजार निर्माण हर नगरीय निकाय क्षेत्र में किया जाना है। उन्होंने कहा कि नगरीय निकाय में लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और विकास कार्यों से जोड़कर उन्हें लाभान्वित करना हमारी प्राथमिकता है। विकास की बुनियाद रखी जा रही है। नगरीय निकाय क्षेत्रों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना से सफाई सुनिश्चित होगी और नाली का गंदा पानी नदी में नहीं बहेगा। उन्होंने कहा कि नगरीय क्षेत्रों में विकास कार्य के लिए उनका विभाग सजग है। लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में हर सम्भव कोशिश की जा रही है। मंत्री डॉ डहरिया ने कहा कि कोरोना काल में भी विकास के कार्य होते रहे, इसी का परिणाम है कि राज्य की योजनाओं और राज्य स्तर पर हुए अनेक कार्यों की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी है। भारत सरकार द्वारा स्वच्छता, शहरी आवास सहित अन्य मामलों में छत्तीसगढ़ को पुरस्कृत किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि नगरीय निकायों को सरकार लगातार सहयोग कर रही है।


