सरगुजा में रियासतकालीन परंपरा के मुताबिक मनाया दशहरा पर्व, प्रजा में बांटीं खुशियां…
सरगुजा। सरगुजा महाराज ने इस बार भी पूर्वजों की परंपरा को जीवित कर दिया। परंपरा के मुताबिक दरबार लगाया और पूर्वजों की परंपरा के अनुसार प्रजा में दशहरा पर्व की खुशियां बांटी। त्रिभुवनेश्वर शरण सिंहदेव के सान्निध्य में दशहरा पर्व राजसी ठाट-बांट के साथ मनाया गया। जिसे देखने के लिए हजारों लोग उमड़ पड़े। बताया जाता है कि वातावरण फिर वैसा ही बन गया था, जैसे राजा अपने दरबार में बैठे हैं और हजारों की संख्या में प्रजा देवता समान महाराजा के समक्ष मौजूद थी।
प्रजा ने देखा सरगुजा पैलेस का वैभव
राज दरबार में प्रवेश करने के लिए हर कोई आतुर था। यहां के वैभव की एक झलक पाने के लिए दूर-दराज से लोग आए थे। हर कोई रियासत के पूर्वजों को याद कर रहा था। उनके न्याय और शौर्य के किस्सों की चर्चाएं थीं। सरगुजा पैलेस दशहरे पर आम जनता के लिए खोला गया था। महाराजा भी राज गद्दी पर विराजे और लोगों को संबोधित किया। महाराजा टीएस सिंहदेव और युवराज आदित्येश्वर शरण सिंहदेव दरबार में लोगों से मिलते रहे। यह सिलसिला देररात तक चलता रहा।
राजसी परंपरा के अनुसार मनाया दशहरा पर्व
परंपरा के मुताबिक यहां दशहरे पर हजारों लोगों की भीड़ जुटती आ रही है। यहां के राज परिवार का दशहरा भी काफी खास होता है। राजसी परंपराएं पूरी करने के लिए पूरा राजपरिवार लोगों के साथ आयोजित कार्यक्रम में शामिल होता है।
कुलदेवी पूजन में एकत्र होता कुटुंब
सरगुजा पैलेस में कुलदेवी पूजा का आज वैसा ही पालन होता है, जो पहले रियासतकाल में था। दशमीं की पूजा के बाद पैलेस में बने विशेष हाल में यह पूजा विधि-विधान से होती है। इस बार महाराजा टीएस सिंहदेव, युवराज आदित्येश्वर शरण सिंहदेव भी वही शान-ओ-शौकत के साथ शामिल हुए।
शस्त्र और नगाड़े का पूजन
महाराजा टीएस सिंहदेव और युवराज आदित्येश्वर शरण सिंहदेव ने राजपुरोहित व बैगा की मौजूदगी में दशहरे पर शस्त्रपूजन किया। पूर्वजों के हथियारों का पूजन किया गया। इसके बाद नगाड़ों की भी विशेष पूजा-अर्चना हुई। शस्त्रपूजन के साथ अश्व और गज की सांकेतिक पूजा की जाती है। इसका मकसद जिले और राज्य में अमन-चैन की कामना है। प्रजा सुरक्षित रहें और खुशहाली का वातावरण रहे।
फिर दिखी पैलेस की रौनक
शाम होते ही पैलेस का दरबार फिर से जगमगाने लगा और लोग प्रजा के समान अपने राजा की बाते सुनने के लिए परिसर में जमा हो गए।
ऐसी है सरगुजा की परंपरा
सरगुजा रियासत में दशहरा उत्सव वास्तव में सरगुजहीन और महामाया देवी की पूजा-अर्चना का पर्व होता है। यहां दो देवियों-सरगुहीन (समलेश्वरी) और महामाया देवी की पूजा एक साथ होती है। इस प्रकार दो देवियों की पूजा एक साथ कहीं देखने को नहीं मिलता। शक्ति संचय का यह नवरात्र पर्व बड़ी श्रद्धा से यहां मनाया जाता है। अश्विन शुक्ल परवा के दिन महामाया देवी के मंदिर में कलश स्थापना का कार्य पूरा होता है। इसे ‘‘पहली पूजा‘‘ कहा जाता है।
इसी दिन से सरगुजा रियासत के अंतर्गत आने वाले राजा, जमींदार, गौंटिया, किसान और ग्रामीण जन यहां इकठ्ठा होते हैं। अष्टमी के दिन राजा की सवारी और महामाया मंदिर में बलि पूजा होती है। फिर दशहरा को राजा की सवारी पुनः देवी दर्शन कर नगर भ्रमण करती हुई राजमहल परिसर में पहुंचती है, जहां मिलन समारोह आयोजित होता है। इसमें राज परिवार के सभी सदस्य, अन्य सामंत, जमींदार, ओहदेदार विराजमान होते थे। इसी परंपरा को आज भी सरगुजा महाराज के परिवार ने जीवंत रखा है।




