मुंगेली जिले में लालपुर को दर्जा तहसील का, सुविधा गांव से भी बदतर-video

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि समय पर न्याय नहीं मिलना भी एक तरह का अन्याय है

• लालपुर संवेदनशील होने के चलते जनपद ही नहीं जिले में रखता है अपना अलग स्थान

• उधारी के अन्य विभागीय लिपिकों के सहारे चल रहा तहसील कार्यालय

• प्रकरणों का पेंडेंसी में नही दिया जा रहा ध्यान

तहसील में इन बेबस फरियादियों का कोई रहनुमा नहीं

तहसील में व्यवस्था के नाम पर अन्य विभागों के जमे कर्मचारी आम फरियादियों के शोषण से बाज नहीं आते

जब तक चढ़ावा नहीं, तब तक न्याय नहीं

मुंगेली। ग्राम पंचायत लालपुर की बहुप्रतीक्षित मांग तहसील के रूप में होने के चलते जनपद ही नहीं जिले में अपना अलग स्थान रखता है। लंबे अरसे बाद राज्य की भूपेश बघेल सरकार ने तहसील घोसित किया मगर आज भी यहां का संचालन पुराने ढर्रे में ही समझ आ रहा है। डिप्टी कलेक्टर रैंक के अधिकारी को तहसील की जिम्मेदारी दी भी गई मगर तहसील में किसी निर्णय आदेश को अंतिम रुप न दे लंबित रखने के सिलसिले से आमजनमानस अपने आप को तहसील दर्जे के बावजूद ठगा महसूस कर रहा है। किसी समय अविभाजित मध्यप्रदेश में के विधानसभा में लालपुर के घटनाक्रम की आवाज गूंजती थी। तहसील मुख्यालय होने का गौरव तो मिला मगर बुनियादी सुविधाओं का घोर अकाल है। गंदगी, जल जमाव, हर वक्त खतरे को दावत देते जर्जर विद्युत तार, दूषित पानी से गांव की पहचान हो रही है। नगरीय सुविधाओं के आस में बैठी करीब पांच हजार की आबादी मन ही मन अपने रहनुमाओं को कोस रही है। मगर अरसे से उपेक्षित गांव में विकास की कहानी कब लिखी जाएगी यह बताने वाला कोई नहीं है। साफ सफाई व्यवस्था सुचारू करने के लिए सफाई कर्मी की तैनाती नही है, गांव में बने बदहाल सीसी सड़क पर कूड़े के ढेर के अलावा जगह-जगह गंदगी का अंबार व टूटी-फूटी गंदगी से जाम नालियों से उठ रही दुर्गंध से लोगों का सांस लेना भी दुश्वार है। गांव में लगे सरकारी नल मरम्मत के अभाव में खराब पड़े हैं, जो ठीक है जल निकासी के अभाव में कचरे के आगोश में हैं। राजस्व सम्बन्धी मामले में जनता पेशी दर पेशी तारीख पर तारीख पाकर न्याय के देवता को गुहार लगाते आसमान ताक रहे हैं, लेकिन भारी मन और बेबसी के अलावा उन्हें कुछ नहीं मिलता।जनप्रतिनिधियों को चुनावी दिनों के पुलाव के अलावा आम दिनों में उनकी थाली झांकने वाले नहीं हैं। किसानों की ज्यादातर मूल समस्याएं फौती, नामांतरण, बटवारा और सीमांकन जैसे मामले ही होते हैं, जिनमें महीनों-महीनों फैसले और निराकरण नहीं हो पा रहा है। कलेक्टर की जिला स्तरीय विभागीय समीक्षा में निराकरण केवल आंकड़ों की खानापूर्ति तक सीमित रहती है जबकि धरातल पर व्यथा-कथा अलग ही है। धान खरीदी चरम स्तर पर है, जो कि राजस्व विभाग के भुइयाँ सॉफ्टवेयर से लिंक है। सॉफ्टवेयर में फसल का रकबा स्वतः शून्य होना, खसरों का छूटना जैसी ढेरों विसंगतियों के कारण किसान तहसील के चक्कर काटने पर मजबूर हैं। किसानों की परेशानियों के बीच शासन की किसान हितैषी तमाम योजनाएं यहाँ खोखली नजर आती हैं।ऐसे हालात में कोई जाए तो जाए कहाँ?

तहसील के लिए आवश्यक व्यवस्था नही,खानापूर्ति हो रही

बता दें लालपुर को तहसील बनाने के बाद तहसील के संचालन के लिए जो पर्याप्त व्यवस्था होने चाहिए बिलकुल नही है अधिकारी अपने अनुसार आते जाते है। तहसील के प्रकरणों का निपटान नही हो पा रहा है।

लालपुर में लगे विद्युत तार जर्जर हो चुके हैं। लूज होकर सड़क छूने को बेताब हैं। आए दिन ¨चगारी के साथ तार टूट कर जमीन पर गिरने से बड़ी दुर्घटना को दावत दे रहे हैं। रात में यह नजारा किसी आतिशबाजी से कम नहीं दिखता। लालपुर समेत पूरे गांव में नाली निर्माण अधूरा छोड़ देने से जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। सड़क ऊंचा होने से बरसात में लोगों के घरों में पानी भरना आम बात है। बाल्टी से घरों का पानी निकाल कर फेंकने की मजबूरी है। बावजूद कोई ठोस पहल नहीं।

तहसील में इन बेबस फरियादियों का कोई रहनुमा नहीं.

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