रायपुर : विष्णुदेव सरकार को सत्ता संभाले डेढ़ साल बीत चुके हैं, मगर अब तक पिछली सरकार के कार्यकाल में जमीं भ्रष्टाचार की परतों को हटाने की दिशा में कोई निर्णायक कदम नजर नहीं आया है। विशेष रूप से राजपत्रित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात करें तो सरकार अब तक इस दिशा में ठोस निर्णय लेने में असमर्थ दिख रही है।
ब्यूरोक्रेसी में लगातार हो रहे स्थानांतरण, पदोन्नति और सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया के बीच, भूपेश सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कुछ अफसर अब भी बेखौफ बने हुए हैं। जॉइंट कलेक्टर और अपर कलेक्टर स्तर के अधिकारियों पर आई शिकायतें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं, और सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ठेकेदारी में करोड़ों का बंदरबांट
सरकार द्वारा आदिवासी और नक्सल प्रभावित जिलों में विकास कार्यों के लिए दी जा रही अतिरिक्त निधियों और रियायतों का लाभ भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। कुछ जिलों में अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों रुपये का घोटाला हुआ, लेकिन अब तक न तो किसी पर कार्यवाही हुई, न ही किसी को दंडित किया गया। बताया जा रहा है कि ऐसे अफसर राजधानी में एक मजबूत सिंडिकेट बनाकर खुद को कानूनी कार्रवाई से बचा रहे हैं।
नौकरियों और टेंडरों के नाम पर वसूली
खुलासे के मुताबिक, कुछ राजपत्रित अधिकारियों ने सत्ता के गलियारों में अपनी सीधी पहुंच का हवाला देकर बेरोजगारों से नौकरी लगवाने और ठेके दिलाने के नाम पर करोड़ों की वसूली की। लेकिन न किसी को नौकरी मिली, न ही कोई काम। ठगे गए लोग आज भी राजधानी में चप्पल घिस रहे हैं, जबकि अधिकारी हर शाम अपने राजनीतिक आकाओं की चौखट पर हाजिरी लगाकर खुद को बचा रहे हैं।
OSD बनने की जोड़तोड़ नाकाम
नए शासन में सत्ता के करीब पहुंचने की जुगत में लगे कुछ संदिग्ध अधिकारियों ने मंत्रियों के ओएसडी बनने के लिए हर कोशिश की, लेकिन उनके विवादास्पद सर्विस रिकॉर्ड और भ्रष्टाचार के फीडबैक के चलते उन्हें यह अवसर नहीं मिला। विधानसभा सत्र में भी इन अधिकारियों पर कार्यवाही की मांग उठी, मगर अब तक वे संरक्षण पाकर खुद को बचाने में सफल नजर आ रहे हैं।