आदिवासी बाहुल्य जिले गरियाबंद में कानून-व्यवस्था, राजस्व, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन का हाल बेहाल, कलेक्टर पर निष्क्रियता का है आरोप

रायपुर। प्रमोटिव कलेक्टर भगवान सिंह उइके की कार्यप्रणाली का गरियाबंद जिले के धीमे विकास पर सीधा और गहरा असर देखने को मिल रहा है, आदिवासी बाहुल्य जिले गरियाबंद में कानून-व्यवस्था, राजस्व, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और आपदा प्रबंधन के लिए कलेक्टर की दक्षता, निष्पक्षता और नेतृत्व क्षमताएं हाल में नगण्य जैसी दिख रही है कलेक्टर के कुशल कार्यप्रणाली से ही तय होता है कि सरकारी नीतियां कितनी प्रभावी होंगी और संसाधन कैसे बंटेंगे, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचनाओं जैसे क्षेत्रों में विकास प्रभावित होता है मगर वर्तमान जिला प्रशासन के नेतृत्व हीन जैसे होने के कारण गरियाबंद जिला विकास से दूर दिख रहा है।

जिले में सक्रिय टीम का अभाव

एक संयोग ही कहा जा सकता है कि इस जिले के अधिकांश विभाग भाड़े के प्रभारी अधिकारी के जिम्मे संचालित हो रहे हैं जिसके कारण निर्णय की क्षमता और पावर की कमी भी विभागों के कार्यों के क्रियान्वयन को धीमा कर रहे हैं। नवेले अधिकारियों या फिर बेमन से पदस्थापना के बाद उनकी कार्य करने की मनोदशा इस आदिवासी जिले के लिए नहीं रहना भी विभाग की लचर अथवा सुस्त कार्यप्रणाली को स्पष्ट कर रहा है।

नाराजगी जगजाहिर

कलेक्टर से अब लोगों की नाराजगी की चर्चा सरे बाजार होने लगी है लगातार उनकी कार्यप्रणाली और कामकाज से जिले के जनप्रतिनिधियों से लेकर आम लोग भी परेशान हैं। जन चर्चा यह भी है कि गरियाबंद कलेक्टर का पद जब से भगवान सिंह उइके ने। संभाला है आमजनमानस अपनी मूलभूत ज्वलंत समस्याओं के लिए भटक रहे है। सूत्रों के अनुसार कलेक्टर के कामकाज को लेकर हमने मुख्यमंत्री , मुख्य सचिव सहित आला अधिकारियों से शिकायत की गई है। अब देखने लायक बात यह है कि हाल में होने वाले कुछ जिलों के कलेक्टरों के फेरबदल में आदिवासी बाहुल्य जिले गरियाबंद के भी कलेक्टर बदलने की संभावना जताई जा रही है।

कथित ठेकेदार फिर दलाल और अब है गायब

बाहरी ठेकेदारों को संरक्षण के भी कलेक्टर पर आरोप लगे है। गरियाबंद कलेक्ट्रेट में जबसे कलेक्टर भगवान सिंह उइके पदस्थ हुए उसी समय से अंबिकापुर से कुछ पहले ठेकेदार बन पैर पसारने लगे आनन फानन में ही करोड़ों के काम जुटाने की चर्चा रही बाद में यही लोग अन्य विभाग या जिला प्रशासन के काम के लिए बतौर दलाल या मीडिएटर की भूमिका में सक्रिय रहे है। अब ये ठेकेदार भी अपने कामकाज छोड़ आदिवासी बाहुल्य जिले गरियाबंद को विकास से और पीछे धकेल गायब है। ऐसे में जिला प्रशासन के पहले मिले संरक्षण बाद में भगोड़ा रहने की भी अंबिकापुर के ये ग्रुप की खासी चर्चा हो रही है।

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