प्रशासन व पुलिस बने रहे मूकदर्शक
प्रकाश पर्व दीपावली पर जिले भर में जमकर आतिशबाजी व शोर-शराबा हुआ। जिसकी वजह से हवा में घुले जहर ने लोगों को सांस लेना दुश्वार कर दिया है। आतिशबाजी के धूम-धड़ाके ने वायु के साथ ही ध्वनि में भी प्रदूषण की मात्रा को डेढ़ गुना तक बढ़ा दिया है। जिसे सामान्य होने में कुछ समय लगेगा। जांच में ध्वनि प्रदूषण सामान्य रूप से 55 से 60 डेसिबल रहना चाहिए जो 82 डेसिबल मिला।
आतिशबाजी के लिए निर्धारित रात दस बजे तक के समय बाद भी लोग पटाखे फोड़ते नजर आए, कही पर किसी तरह की रोका टोकी नहीं की गई।
इसके अलावा शहर के हृदय स्थल कहे जाने वाले गोल बाजार, सोनार पारा, दाऊपारा,बालानी चौंक, सिन्धी कैम्प,पड़ाव चौंक आदि क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर पटाखेबाजी का चलन शहर के अन्य हिस्सों से ज्यादा रहता है।
यदि इन सभी स्थानों पर भी प्रदूषण मापने की व्यवस्था होती तो आंकड़े कुछ और बता रहे होते। फिर भी जो तस्वीर सामने आई है, वह भी चौंकाने वाली है। पटाखों के लिए अधिकतम 120 डेसिबल की आवाज निर्धारित है लेकिन दिवाली पर एक साथ पटाखे चलने से यह नियम तार-तार हो गया।
शहर के मुख्य इलाकों में सोमवार को ज्यों ही शाम ढली और लोग दीवाली के उत्सव में सराबोर हुए, त्यों ही पटाखों की सामूहिक ध्वनि ने आने-जाने वाले ही नहीं घरों में दुबके बुजुर्गों को भी कानों को तेजी से बंद करने को विवश कर दिया। पटाखों की तेज आवाज से ह्रदय रोगी भी परेशान दिखे। साथ ही पटाखों के धुएं से बढ़ा प्रदूषण अस्थमा रोगियों के लिए भी खतरनाक रहा। फिलहाल गनीमत रही कि पटाखों की कोई अप्रिय घटना जिला अस्पताल प्रशासन के संज्ञान में नहीं आई। हालांकि इक्का-दुक्का मामले गांवों में हुए तो स्थानीय डॉक्टरों तक सिमटकर रह गए।