प्रेम के महत्व का पर्व है ललिता सप्तमी

–अरविन्द तिवारी

भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को यानि आज श्रीराधा रानी की करीबी सखी और हर कला में निपुण ललिता देवी को समर्पित ललिता सप्तमी मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन ललिता देवी प्रकट हुई थी। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि ललिता सप्तमी प्रेम के महत्व को बताने वाला पर्व है। ये वृंदावन की सबसे महत्वपूर्ण गोपियों में सबसे वफादार और सबसे बड़ी थी , इनको श्रीराधाजी की नित्य और निष्ठावान सखी के रूप में याद किया जाता है। ये निर्भय होकर भगवान श्रीकृष्ण से वाद – विवाद करती थीं और हमेशा श्रीराधाजी का ही पक्ष लेती थीं।अन्य सभी अष्टसखियां ललिता देवी के मार्गदर्शन में ही कार्य करती थीं। वे श्रीकृष्ण और राधा की सेवा के लिये अपने संरक्षक के रूप में ललिता देवी को बहुत भक्ति और सम्मान देते थे। ललिता को प्रेम की बहुत ही गहरी समझ थी , इसलिये वे राधाकृष्ण के सबसे करीब थी। उनकी एकमात्र इच्छा श्रीराधा और कृष्ण की सेवा करना था। संपूर्ण ब्रजमंडल में ललिता देवी के प्रेम और आस्था की कथायें सुनायी जाती है। ललिता सप्तमी त्यौहार राधाष्टमी से एक दिन पहले और जन्माष्टमी के चौदह दिन बाद मनायी जाती है। ललिता देवी राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की सबसे प्यारी गोपी में से एक थीं , बरसाना के ऊंचागांव में ललिता अटोर नामक पहाड़ी पर ललिता के नाम से एक प्रसिद्ध भव्य मंदिर भी है। ललिता सप्तमी गोपिका ललिता की जयंती के रूप में मनाया जाता है। ये सख्त , आत्मविश्वासी और मुखर होने के लिये भी जानी जाती थी। ये राधा और कृष्ण के प्रेम और निकुंज लीलाओं की साक्षी थीं। ललिता राधा को सुख प्रदान कराने वाली प्रमुख सखी और उनकी विविध लीलाओं में सहगामी थीं। कहते हैं कि ललिता भी श्रीकृष्ण से उतना ही प्रेम करती थी जितना की राधा , परंतु ललिता ने अपने प्रेम को कभी भी अभिव्यक्त नहीं किया था। गोपियों में कृष्ण के प्रेम की अधिकारिणी इन्हें ही माना गया है। परन्तु इनमें से किसी का राधा से ईर्ष्याभाव नहीं था। नित्य बिहारी राधा-कृष्ण की ललिता अभिन्न सहचरी रहीं। कहते हैं कि स्वयं भगवान शिव ने भी ललिता से ‘सखीभाव’ की दीक्षा प्राप्त की थी। ललिताजी ने शिवजी से कहा था कि रासलीला में श्रीकृष्‍ण के अतिरिक्त किसी पुरुष को प्रवेश नहीं है तब शिवजी को भी सखी बनना पड़ा था।मान्यता है कि अकबर के समय में राधारानी की सखी ललिता ने स्वामी हरिदास के रूप में अवतार लिया था। स्वामी हरिदास वृन्दावन के निधिवन के एकांत में अपने दिव्य संगीत से प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) को रिझाते थे। बांके बिहारी नाम से वृन्दावन में मंदिर स्थित है जिसकी स्थापना स्वामी हरिदास ने की थी। तानसेन भी उनके संगीत और गायन के बहुत ही ज्यादा प्रभावित थे। ललिता सखी श्रीराधारानी और भगवान श्रीकृष्ण की सबसे प्रिय थीं , भक्त इस दिन व्रत रखकर श्रीकृष्ण और राधारानी के साथ ललिता देवी की भी पूजा करते हैं। इस व्रत को पहली बार श्रीकृष्ण द्वारा बताये जाने पर रखा गया था। इस दिन मुख्य रूप से वैष्णव समुदाय के लोग बहुत श्रद्धा से ललिता देवी की पूजा अर्चना और अनुष्ठान करते हैं तथा इसे एक त्यौहार के रूप में मनाते हैं। किवदंती है कि ललिता देवी के आशीर्वाद से संतान प्राप्ति के योग बनते हैं इसलिये नवविवाहित जोड़े इनकी पूजा-अर्चना बड़ी श्रद्धा से करते हैं। ललिता देवी सभी यानि राधा रानी की आठ गोपियों में सबसे प्यारी गोपी के रूप में जानी जाती हैं। वह आठवीं गोपी थी और उनके गोपियों के समूह को अष्टसखियों के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि जब राधा और कृष्ण परम युगल की लीलाकरते थे और उनके चरण कमलों में पसीने की एक बूंद भी आती थीं तो ललिता देवी लाखों रूप धारण कर उसे दूर कर देती थी। अन्य अष्टसखियों में विशाखा , चित्रलेखा , चम्पकलता , तुंगविद्या , इंदुलेखा , रंगादेवी और सुदेवी हैं। सभी आठ गोपियां यानि जिन्हें अष्टसखायें भी कहते हैं , वे अपने प्यारे भगवान कृष्ण और राधा रानी के लिये दिव्य प्रेम प्रदर्शित करती हैं। माना जाता है कि राधाकृष्ण के लिये इन अष्टसखियों के पास जो प्रेम है , उसकी कोई बराबरी भी नहीं कर सकता। ललिता देवी में भगवान कृष्ण और राधा देवी के प्रति अत्यधिक जुनून और गरिमा थी। बता दें कि ललिता देवी का जन्म करेहला गांव में हुआ था और फिर उनके पिता उन्हें उक्कागांव ले गये। इस स्थान पर अभी भी ललिता देवी और अन्य गोपियों द्वारा भगवान कृष्ण की सेवा के लिये इस्तेमाल किये गये उनके कमल के पैरों और बर्तनों के निशान दिखाई देते हैं। कभी-कभी सूरज की रोशनी में उनके कमल के पैरों के निशान चमकते हैं। ब्रज भूमि और वृंदावन सबसे लोकप्रिय स्थान हैं जहां धार्मिक रूप से ललिता सप्तमी मनायी जाती है। यह श्रीकृष्ण और राधा रानी के लिये ललिता देवी के स्नेह का सबसे शुभ दिन है। ब्रजभूमि में स्थित प्रसिद्ध पवित्र ललिता कुण्ड भक्तों को मुक्ति दिलाने के लिये प्रसिद्ध है। यह सबसे भाग्यशाली और शुभ अभिव्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है जो श्रीराधा और कृष्ण के लिये ललिता देवी के प्रेम और भक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो समर्पण और भक्ति के मार्ग में सभी बाधाओं को दूर करता है। ब्रह्मांड पुराण में ललितोपाख्यान शीर्षक को ललिता सहस्रनाम स्तोत्र कहते हैं , जिसकी महिमा की कोई सीमा नही है। भगवान विष्णु के अवतार हयग्रीव ने इसे सबसे पहले ऋषि अगस्त्य को सुनाया व सिखाया था। श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ करने से अपार संपदा , सुंदरता, तेज व ऐश्वर्य सहित मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है वहीं बांझपन , असाध्य रोगों से मुक्ति व शत्रुता की समाप्ति भी होती है।
भगवान श्रीकृष्ण की पूजा राधा रानी के बिना अधूरी है , इसलिये जब-जब श्रीकृष्ण के नाम का स्मरण किया जाता है , तब-तब राधा रानी का नाम जपा जाता है। और जब-जब राधा रानी का जिक्र आता है , तब-तब उनके सखियों का भी जिक्र होता है। वैसे तो राधारानी की अनगिनत सखियां थीं, लेकिन उनकी आठ सखियां ऐसी थीं जो राधारानी के साथ-साथ भगवान श्री कृष्ण के भी करीब थीं , राधा की ये सखियां उनका पूरा ध्यान रखती थीं जिन्हें अष्टसखी कहा जाता है। राधा की सभी सखियां कई कलाओं में निपुण थीं , किसी को संगीत का अच्छा ज्ञान था तो किसी को प्रकृति के रहस्यों का।

श्रीललिता देवी

राधा रानी की सभी आठ सखियां विशेष गुणों से युक्त थीं। राधा की पहली सखी का नाम था श्री ललिता देवी जो मोरपंख के रंग की साड़ी पहनती थीं , ये राधा की सबसे खास और प्रिय सखियों में से एक थी। इन्हें सुंगध का खास ज्ञान और समझ थी , ये राधा को पान का बीड़ देती थीं.।

विशाखा 

राधारानी की दूसरी सखी का नाम विशाखा था , ये सुंदर वस्त्र बनाने में निपुण थीं जो राधारानी को कर्पूर-चंदन से बनी हुई चीजें देती थीं।

चित्रा

चित्रा को ऋंगार का अच्छा ज्ञान था , ये राधारानी का ऋंगार किया करती थी और अपने इशारों से ही राधाजी को बातें समझा दिया करती थी। कहते हैं कि चित्रा के अंगों की चमक केसर की तरह थी।

इन्दुलेखा

लाल रंग की साड़ी पहनने वाली और हमेशा प्रसन्न रहने वाली राधा की चौथी सखी इंदुलेखा थी जो नृत्य और गायन में निपुण थीं।

चंपकलता

नीले रंग की साड़ी पहनने वाली चंपकलता चित्रा सखी की तरह राधा रानी का श्रृंगार किया करती थी , देखने में फूल की भांति सुंदर होने से इनका नाम चंपकलता था।

रंगदेवी

रंगदेवी राधा की छठी सखी थी , जो राधाजी के चरणों में जावक (महावर) लगाने का कार्य करती थी। इसके साथ-साथ इन्हें सभी व्रतों के विधान का ज्ञान था।

तुंगविद्या

अपनी कुशाग्र बुद्धिमता के लिये जानी जाने वाली तुंगविद्या की बुद्धि बहुत तेज थीं. तुंगविद्या को ललित कलाओं की खास समझ के साथ-साथ संगीत की भी अच्छी समझ थी।

सुदेवी

मंगे रंग की साड़ी पहनने वाली सुदेवी श्रीराधारानी की आठवीं सखी थी। ये राधाजी को जल पिलाने का कार्य किया करती थी , इन्हें जल शुद्ध और निर्मल करने का अच्छा ज्ञान था।

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