भगवान विष्णु को समर्पित मोक्ष प्रदात्री इंदिरा एकादशी आज

~ अरविन्द तिवारी

हिंदू धर्म में सभी व्रतों में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इंदिरा एकादशी के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मोक्ष देने वाली इंदिरा एकादशी कहते हैं , जो आज सिद्ध योग में है। राजा इंद्रसेन ने भी अपने पिता को मोक्ष दिलाने के लिये पितृपक्ष में पड़ने वाली एकादशी का व्रत रखा था और तभी से राजा के नाम पर ही इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी पड़ गया। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। ऐसे में इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है और पूजा के समय इंदिरा एकादशी व्रत की कथा श्रवण करते हैं। जो लोग इस व्रत को करते हैं , उनको मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। पितृ पक्ष में आने से इंदिरा एकादशी का महत्व और बढ़ जाता है। वैसे तो सभी को एकादशी का व्रत रखना चाहिये लेकिन जिनके माता-पिता का निधन हो चुका है , उन्हें पितृपक्ष में पढ़ने वाली इंदिरा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिये। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इंदिरा एकादशी का व्रत सभी घरों में करना चाहिये। जो भी व्यक्ति इंदिरा एकादशी का व्रत रखता है और उस व्रत पुण्य को अपने पितरों को समर्पित कर देता है , तो इससे उसके पितरों को लाभ होता है। सात पीढ़ियों तक के जो पितर यमलोक में यमराज का दंड भोग रहे होते हैं , उनको इंदिरा एकादशी व्रत के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ऐसा करने से आपके पितर नरक लोक के कष्ट से मुक्त होकर जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और उनको श्रीहरि विष्णु के चरणों में स्थान मिलता है। इससे प्रसन्न होकर पितर सुख , समृद्धि , वंश वृद्धि , उन्नति आदि का आशीष देते हैं और मृत्यु के बाद व्रती भी बैकुंठ में निवास करता है।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

सतयुग में महिष्मति नाम की नगरी में परम विष्णु भक्त और धर्मपरायण राजा इंद्रसेन राज करते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे और उनकी प्रजा सुख चैन से रहती थी। एक दिन नारद जी इंद्रसेन के दरबार में जाते हैं। नारद जी कहते हैं मैं तुम्हारे पिता का संदेश लेकर आया हूं जो इस समय पूर्व जन्म में एकादशी का व्रत भंग होने के कारण यमराज के निकट दंड भोग रहे हैं। नारदजी के मुख से इंद्रसेन अपने पिता की पीड़ा को सुनकर व्यथित हो गये और पिता के मोक्ष का उपाय पूछने लगे। तब नारद ने कहा कि राजन तुम कृष्ण पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो और इस व्रत के पुण्य को अपने पिता के नाम दान कर दो , इससे तुम्हारे पिता को मुक्ति मिल जायेगी। नारद जी की ये बात सुनकर राजा ने उनसे व्रत का विधान पूछा और व्रत करने का संकल्प लिया। राजा ने पितृपक्ष की एकादशी पर विधि-पूर्वक व्रत किया , पितरों के निमित्त मौन रह कर ब्राह्मण भोज और गौ दान किया। इस प्रकार राजा इंद्रसेन के व्रत और पूजन करने से उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिलने के साथ साथ बैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई। उस दिन से इस व्रत का नाम इंदिरी एकादशी पड़ गया।

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