
काम है शासन की योजनाओं की जानकारी देना। जिम्मेदारी है योजनाओं को अनुदान के साथ हितग्राहियों तक पहुंचाने की। समय-समय पर खेती- किसानी से जुड़ी समस्याओं को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने के भी काम करने हैं लेकिन जिले के ग्राम सेवक इसे एक किनारे रख कर निजी कंपनियों के एजेंट बनकर उनके प्रॉडक्ट बेच रहें हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी योजनाएं किस गति से चल रही होंगी।

ग्राम सेवक। कोटवार के बाद सरकार का ऐसा दूसरे नंबर का कर्मचारी, जिसे शासकीय कामकाज की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। इस लिहाज से यह बेहद अहम है क्योंकि ग्राम सेवक पर ही योजनाएं ग्रामीणों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है। फिलहाल जिले के ग्राम सेवक यह जिम्मेदारी किस तरह निभा रहे हैं, यह जांच का विषय हो सकता है क्योंकि जिले के अधिकांश ग्राम सेवक, मुख्यालय से दूर निजी कंपनी के उत्पाद बेचने में व्यस्त हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण भटकने और इंतजार करने के लिए विवश हैं।
~ दोहरा लाभ
निजी कंपनियों के एजेंट की भूमिका में दिखाई दे रहे ग्राम सेवक, जिस तरह अपने संपर्कों का लाभ उठाकर कृषि दवाएं, बीज व कृषि उपकरण बेच रहे हैं, उनमें कहीं विक्रय का लक्ष्य पूरा करने के बाद लाभांश राशि मिल रही है, तो कहीं उत्पादन विक्रय में सामग्री की मात्रा, अतिरिक्त आय प्रदान कर रही है। यह राशि, उस राशि से अतिरिक्त है जो नियमित वेतन के रूप में बतौर ग्राम सेवक को मिलती है।
~ लटकी योजनाएं
कोरोला काल में संकट के दौर से गुजरती, ग्रामीण आबादी को राहत के लिए योजनाएं पहुंच रहीं हैं लेकिन प्रारंभिक स्थिति में ही इन्हें झटका लग रहा है क्योंकि ग्राम सेवक मुख्यालय में नहीं मिल रहे हैं। कब मिलेंगे या कब आएंगे ? जैसे सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे। यह इसलिए क्योंकि पूछने पर योजना का लाभ नहीं मिलने की गारंटी पक्की है।
~ यह दोनों भी परेशान
ग्रामीण हितग्राही और मुख्यालय के आला अधिकारी दोनों परेशान है। ग्रामीण इसलिए क्योंकि खेती किसानी का काम अटका पड़ा हुआ है। अफसर इसलिए हलकान हैं क्योंकि फिलहाल शासकीय कामकाज के केंद्र में, गांव और खेती किसानी ही है। इसलिए पूछे जा रहे रोज के सवाल के जवाब तो ग्राम सेवक से लिए जाने हैं।