- आदिवासी अंचल के लिए हुई सीधी भर्ती, फिर मुंगेली में लंबे समय से संलग्नीकरण का आरोप; शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से विभागीय कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
(एक्सक्लुसिव रिपोर्ट)
रायपुर/मुंगेली। लोक निर्माण विभाग (PWD) के मुंगेली डिवीजन में एक लिपिक की पदस्थापना, संलग्नीकरण और विभागीय प्रभार को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बस्तर संभाग के चिन्हित आदिवासी अंचलों के लिए सीधी भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्त लिपिक राम नारायण साहू लंबे समय से अपनी मूल पदस्थापना से बाहर मुंगेली डिवीजन में कार्यरत हैं। इस मामले में पूर्व में विभागीय अधिकारियों एवं शासन स्तर पर शिकायतें किए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद स्थिति स्पष्ट नहीं होने से विभागीय नियमों के पालन और अधिकारियों की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
-चिन्हित आदिवासी जिलों के लिए हुई थी भर्ती, मूल पदस्थापना से बाहर काम करने पर सवाल
प्राप्त जानकारी के अनुसार, लगभग 15 वर्ष पूर्व लोक निर्माण विभाग में लिपिकीय पदों पर बस्तर क्षेत्र के सात चिन्हित आदिवासी जिलों के लिए हलफनामे एवं निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के आधार पर नियुक्तियां की गई थीं। आरोप है कि नियुक्ति के बाद कुछ समय तक मूल पदस्थापना स्थल पर सेवा देने के पश्चात राम नारायण साहू संलग्नीकरण के माध्यम से मुंगेली डिवीजन पहुंच गए और वहां लंबे समय से कार्य कर रहे हैं।
इस मामले में प्रमुख सवाल यह है कि संबंधित कर्मचारी का संलग्नीकरण किस सक्षम प्राधिकारी के आदेश से किया गया, उसकी वैधानिक अवधि क्या है तथा वर्तमान में मुंगेली डिवीजन में कार्य करने के लिए उसके पास कौन-सा प्रभावी प्रशासनिक आदेश है। इन बिंदुओं पर विभागीय दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।
-विभागीय अधिकारियों की शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
बताया जाता है कि विभाग के कुछ कार्यपालन अभियंताओं ने संबंधित कर्मचारी की सेवा शर्तों और वास्तविक पदस्थापना को लेकर शासन तथा सचिव स्तर पर जानकारी दी थी। इसके बावजूद यदि संलग्नीकरण समाप्त करने अथवा मामले की समीक्षा करने संबंधी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है, तो यह विभागीय निगरानी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
विभागीय नियमों के विपरीत किसी कर्मचारी को लंबे समय तक मूल पदस्थापना से बाहर बनाए रखने की स्थिति में संबंधित आदेशों, सक्षम अधिकारी की स्वीकृति और लागू सेवा शर्तों की जांच जरूरी है। केवल शिकायतों के आधार पर किसी व्यवस्था को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन शिकायतों का समयबद्ध निराकरण नहीं होना भी प्रशासनिक जवाबदेही का विषय है।
-मंत्री के गृह जिले में ही नियमों के पालन पर सवाल
मुंगेली जिले से लोक निर्माण विभाग के मंत्री अरुण साव का राजनीतिक संबंध होने के संदर्भ में भी इस मामले को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा शासकीय कार्यों में अनावश्यक संलग्नीकरण समाप्त करने और कर्मचारियों से नियमानुसार कार्य लेने की नीति पर जोर दिए जाने के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित कर्मचारी की वर्तमान पदस्थापना किस नियम और आदेश के तहत जारी है।
यदि संलग्नीकरण के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, तो संबंधित आदेश जारी करने वाले अधिकारियों और उसे जारी रखने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए।
-वेतन भुगतान और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों की जांच जरूरी
शिकायतों में यह भी आरोप लगाए जाने की बात कही जा रही है कि संबंधित कर्मचारी ने अपनी पदस्थापना और संलग्नीकरण से जुड़े तथ्यों के संबंध में विभाग तथा माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष सही स्थिति प्रस्तुत नहीं की। हालांकि, इस संबंध में न्यायालयीन अभिलेखों और संबंधित आदेशों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। बिना प्रमाण के न्यायालय को गुमराह करने अथवा अनधिकृत रूप से वेतन प्राप्त करने के आरोपों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित कर्मचारी का वेतन किस कार्यालय से और किस स्वीकृत पदस्थापना के आधार पर आहरित किया जा रहा है। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जा सकती है।
-जांच के दायरे में कर्मचारी के साथ जिम्मेदार अधिकारी भी आएं
इस पूरे प्रकरण में मुख्य प्रश्न केवल एक कर्मचारी की पदस्थापना का नहीं, बल्कि विभागीय आदेशों के पालन, प्रशासनिक नियंत्रण और शिकायतों के निराकरण का भी है। यदि संबंधित संलग्नीकरण नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो उसे नियमानुसार समाप्त कर मूल पदस्थापना के संबंध में निर्णय लिया जाना चाहिए। साथ ही, संलग्नीकरण को स्वीकृति देने, अवधि बढ़ाने अथवा शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं करने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच भी आवश्यक है।
अब देखना होगा कि लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में उपलब्ध अभिलेखों की जांच कराते हैं या नहीं। शासन स्तर पर निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मुंगेली डिवीजन में संबंधित कर्मचारी की पदस्थापना एवं प्रभार वैधानिक हैं या विभागीय व्यवस्था में किसी स्तर पर चूक हुई है।