उसलापुर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, ओम शांति सरोवर उसलापुर के तत्वावधान में ब्रह्माकुमारीज समाज सेवा प्रभाग के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर पर “गौरवपूर्ण वृद्धावस्था एवं सम्मानित जीवन” विषय पर प्रेरणादायी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठजनों के प्रति सम्मान, आत्मीयता एवं कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ-साथ वृद्धावस्था को जीवन के अनुभव, गरिमा और आध्यात्मिक उन्नति की स्वर्णिम अवस्था के रूप में देखने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ परमात्म स्मृति एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। दीप प्रज्वलन के माध्यम से वरिष्ठजनों के जीवन अनुभवों एवं उनके आशीर्वाद रूपी प्रकाश को समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया गया।
कार्यक्रम में माननीय वरिष्ठ भ्राता रामचंद्र यादव जी (एल्डरमैन, उसलापुर), माननीय वरिष्ठ भ्राता सोहन वैष्णव जी, माननीय वरिष्ठ भ्राता राकेश भोसले जी (अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा), माननीय वरिष्ठ भ्राता प्रमोद शर्मा जी (अध्यक्ष, गौसेवा सेवा आयोग), माननीय वरिष्ठ भ्राता रामसेवक कुशवाहा जी (सदस्य, भारतीय जनता पार्टी), माननीय वरिष्ठ भ्राता आजूराम ध्रुव जी तथा आदरणीय बीके छाया दीदी जी (मुख्य संचालिका, ब्रह्माकुमारीज सेवाकेंद्र, उसलापुर) की गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए माननीय भ्राता सोहन वैष्णव जी ने कहा कि बच्चों के संस्कार उनके आसपास के वातावरण और परिवार के व्यवहार से निर्मित होते हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता एवं बड़ों को करते हुए देखते हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भविष्य में हमारा सम्मान करें, तो सबसे पहले हमें स्वयं उनके सामने सम्मान, प्रेम और संस्कारों का आदर्श प्रस्तुत करना होगा। हमारे आज के संस्कार ही आने वाले समय में हमारे साथ होने वाले व्यवहार का आधार बनते हैं।
माननीय भ्राता रामचंद्र यादव जी ने कहा कि पितृपक्ष में हम अपने पूर्वजों एवं बुजुर्गों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं, लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि जब वे हमारे बीच जीवित हैं, तभी उन्हें प्रेम, सम्मान और अपनापन दिया जाए। उन्होंने कहा कि माता-पिता की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि उनके बच्चे उनके साथ रहें और उनका सहारा बनें। हमें माता-पिता की सेवा को दायित्व नहीं, बल्कि अपना सौभाग्य समझना चाहिए, क्योंकि उनके आशीर्वाद और दुआएं जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
माननीय भ्राता आजूराम ध्रुव जी ने अपने जीवन के आध्यात्मिक अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब से उन्होंने अपना तन-मन-धन परमार्थ एवं सेवा में समर्पित किया है, तब से प्रत्येक क्षण परमात्मा का साथ और सहयोग अनुभव किया है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में उनकी आयु 90 वर्ष है, लेकिन परमात्मा की स्मृति और सकारात्मक जीवनशैली के कारण वे आज भी आनंद एवं उत्साह का अनुभव करते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, यदि मन परमात्मा की याद से जुड़ा रहे तो विपरीत परिस्थितियों में भी भीतर से शक्ति, शांति और आनंद की अनुभूति होती है।
माननीय भ्राता राकेश भोसले जी, अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा, ने कहा कि आज समाज में कुछ बच्चे अपने बुजुर्गों से दूरी बनाने लगे हैं, ऐसे में बच्चों को श्रेष्ठ संगति और संस्कार देना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्था में अच्छे संस्कारों एवं दैवी गुणों का बीजारोपण किया जाता है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि स्वयं भी ऐसे श्रेष्ठ वातावरण से जुड़ें और अपने बच्चों को भी अच्छे संस्कार एवं सत्संग का वातावरण प्रदान करें, ताकि उनमें बड़ों के प्रति सम्मान और सेवा की भावना विकसित हो।
माननीय भ्राता प्रमोद शर्मा जी, अध्यक्ष, गौसेवा सेवा आयोग, ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने लगभग 5000 गायों की सेवा की है और इस सेवा से उन्हें आत्मिक संतोष एवं सकारात्मक अनुभूतियां प्राप्त हुई हैं। उन्होंने ब्रह्माकुमारी संस्था की सराहना करते हुए कहा कि ब्रह्माकुमारी बहनों ने अपना जीवन समाज एवं मानव सेवा के लिए समर्पित किया है, जो सभी के लिए प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हम अपने माता-पिता की सेवा करते हैं, उसी भावना से गौमाता की भी सेवा करनी चाहिए, क्योंकि वे मूक होकर भी मानव जीवन को अनेक प्रकार से लाभान्वित करती हैं।
माननीय भ्राता रामसेवक कुशवाहा जी ने कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्था का उद्देश्य विश्व कल्याण है। यहां मनुष्य को स्वयं का तथा परमात्मा का सत्य परिचय प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने जीवन में शांति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव करने के लिए किसी भी समय ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ सकता है।
इस अवसर पर कार्यक्रम की मुख्य वक्ता आदरणीय बीके छाया दीदी जी, मुख्य संचालिका, ब्रह्माकुमारीज सेवाकेंद्र उसलापुर, ने सभी वरिष्ठजनों एवं उपस्थित माता-बहनों को अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वृद्धावस्था को जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि अनुभव, सेवा और आध्यात्मिक उन्नति का सुंदर अवसर समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि आयु बढ़ने के साथ व्यक्ति को यह नहीं सोचना चाहिए कि अब वह कुछ नहीं कर सकता। जीवन का प्रत्येक पड़ाव अपने साथ एक नई भूमिका और नई संभावना लेकर आता है।
उन्होंने कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्था के संस्थापक आदि पिता प्रजापिता ब्रह्मा बाबा ने 60 वर्ष की आयु में परमात्म-ज्ञान प्राप्त किया और उसके पश्चात अपना पूरा जीवन विश्व कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने ज्ञान और राजयोग का संदेश विश्वभर में पहुंचाने के लिए अथक पुरुषार्थ किया। आज उनकी प्रेरणा से यह संस्था विश्व के अनेक देशों में मानव जीवन में शांति, सद्भावना एवं श्रेष्ठ संस्कारों का संदेश दे रही है।
बीके छाया दीदी जी ने कहा कि 60 वर्ष की आयु के बाद का समय भी अत्यंत मूल्यवान है। इस अवस्था में व्यक्ति अपने अनुभवों का लाभ समाज को दे सकता है, परमात्मा की स्मृति में समय लगाकर अपने जीवन को अधिक सार्थक बना सकता है तथा सेवा एवं पुण्य कर्मों द्वारा अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। उन्होंने कहा कि आज कई युवा भी जीवनशैली के कारण निष्क्रियता की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि हमारे अनेक बुजुर्ग प्रातः जल्दी उठकर अपने दैनिक कार्य करते हुए सक्रिय एवं अनुशासित जीवन जीते हैं। इसलिए उम्र को कमजोरी का आधार न मानकर अनुभव और प्रेरणा की शक्ति के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने वरिष्ठजनों को संदेश देते हुए कहा कि “आपका जीवन स्वयं एक अनुभव की पुस्तक है। आपके अनुभव आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन बन सकते हैं।” वरिष्ठजनों का सम्मान केवल एक दिन का कार्यक्रम न होकर परिवार और समाज के संस्कारों का स्थायी हिस्सा बनना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी विशिष्ट अतिथियों का तिलक, पुष्पमाला, शाल, पटका, श्रीफल एवं ईश्वरीय सौगात भेंट कर सम्मान किया गया। साथ ही कार्यक्रम में उपस्थित लगभग 70 वरिष्ठ नागरिकों एवं बुजुर्गों का तिलक, पुष्पमाला, पटका, श्रीफल एवं प्रसाद भेंट कर आत्मीय एवं स्नेहपूर्ण सम्मान किया गया।
कार्यक्रम का वातावरण वरिष्ठजनों के प्रति सम्मान, प्रेम, कृतज्ञता और आत्मीयता से ओत-प्रोत रहा। कार्यक्रम ने समाज को यह सुंदर संदेश दिया कि वरिष्ठजन परिवार और समाज की जीवंत धरोहर हैं। उनके अनुभव मार्गदर्शन देते हैं, उनके संस्कार पीढ़ियों को दिशा देते हैं और उनका आशीर्वाद जीवन को संबल प्रदान करता है। इसलिए वृद्धावस्था को बोझ नहीं, बल्कि गरिमा, अनुभव, सेवा और आध्यात्मिक उन्नति से परिपूर्ण जीवन की एक सुंदर अवस्था के रूप में स्वीकार करना चाहिए।