बिलासपुर। कहने को पालतू जानवर सिर्फ जानवर होते हैं, लेकिन जिन घरों में वे वर्षों तक परिवार के सदस्य की तरह रहते हैं, वहां उनका जीवन और निधन दोनों ही भावनाओं से जुड़ जाते हैं। बिलासपुर में सामने आया एक ऐसा ही मामला अब इंसानियत, संवेदना और समाज की सोच पर सवाल खड़े कर रहा है।
शहर के एक मोहल्ले में एक परिवार ने अपने पालतू कुत्ते की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक मुक्तिधाम में किया। परिवार के लिए यह कोई प्रदर्शन या विवाद का विषय नहीं, बल्कि उस जीव के प्रति अंतिम सम्मान था, जिसे उन्होंने लंबे समय तक अपने परिवार का हिस्सा माना था। लेकिन अंतिम संस्कार के बाद अलग-अलग लोगों की ओर से इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं।
मामला तब और चर्चा में आया, जब इस घटना को लेकर शिकायत थाने तक पहुंच गई। इसके बाद संबंधित परिवार के साथ जिस तरह की कार्रवाई और व्यवहार किया गया, उससे परिवार को ऐसा महसूस हुआ मानो उन्होंने कोई गंभीर अपराध कर दिया हो। बताया जा रहा है कि मामले में संभ्रांत परिवार को माफीनामा देने के बाद कुछ सख्त हिदायतों और पाबंदियों के साथ राहत दी गई।
सवाल सिर्फ एक अंतिम संस्कार का नहीं, सोच का है
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या किसी परिवार को अपने पालतू जीव की मृत्यु पर सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देने का अधिकार भी सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर करेगा?
जिस पशु को परिवार ने वर्षों तक अपने साथ रखा, उसके अंतिम समय में भावनात्मक रूप से सम्मान देना क्या इतना बड़ा विषय है कि परिवार को सार्वजनिक चर्चा, शिकायत और पुलिसिया प्रक्रिया का सामना करना पड़े?
बेशक, सार्वजनिक मुक्तिधाम के उपयोग से जुड़े नियम और व्यवस्थाएं अलग विषय हैं। यदि किसी स्थान के उपयोग के संबंध में निर्धारित नियम हैं, तो उनका पालन होना चाहिए। लेकिन ऐसे मामलों में नियमों के साथ मानवीय संवेदना और स्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था भी जरूरी है।
– बेजुबान जानवरों के अंतिम संस्कार के लिए व्यवस्था कहां है?
यह मामला प्रशासन और नगर व्यवस्था के सामने एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न भी रखता है। शहर में रोजाना बड़ी संख्या में आवारा अथवा पालतू पशुओं की मृत्यु होती है। ऐसे में उनके सम्मानजनक अंतिम संस्कार या दफन के लिए क्या कोई निर्धारित स्थान है? क्या जिला प्रशासन, नगर निगम अथवा किसी सामाजिक संगठन ने पशुओं के अंतिम संस्कार के लिए कोई स्थायी व्यवस्था विकसित की है?
– यदि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है तो लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे मृत पशुओं का क्या करें?
– यही वह सवाल है, जिसका जवाब इस पूरे विवाद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
– गाय को माता मानने वाले समाज में संवेदना का यह अंतर क्यों?
भारतीय समाज में पशुओं के प्रति संवेदना और आस्था की गहरी परंपरा रही है। गाय को माता का दर्जा दिया जाता है, वहीं घरों में पालतू कुत्ते, बिल्ली और दूसरे जीव भी वर्षों तक परिवार का हिस्सा बनकर रहते हैं।
फिर किसी पशु की मृत्यु के बाद उसके प्रति सम्मान दिखाने वाले परिवार को संदेह या उपहास की नजर से क्यों देखा जाए?
यह भी विचार का विषय है कि इंसान के अंतिम संस्कार के लिए सम्मानजनक व्यवस्था समाज की जिम्मेदारी मानी जाती है, तो बेजुबान जीवों के मामले में संवेदना और व्यवस्था दोनों के लिए कोई स्पष्ट नीति क्यों नहीं होनी चाहिए?
आज तमाशा बना, कल व्यवस्था की जरूरत होगी
इस घटना में परिवार ने अपने पालतू जीव को अंतिम विदाई देकर शायद किसी व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास नहीं किया था। उन्होंने केवल अपने परिवार के एक सदस्य को खोने का दुख महसूस किया और अपनी भावनाओं के अनुरूप उसे अंतिम सम्मान दिया।
लेकिन घटना के बाद जिस तरह मामला चर्चा और शिकायत का विषय बना, उसने यह जरूर दिखा दिया कि हमारे समाज में पशु प्रेम और पशुओं के सम्मान को लेकर अभी भी सोच में कई स्तरों पर अंतर मौजूद है।
आज एक परिवार के लिए परिस्थिति को तमाशा बनाना आसान हो सकता है, लेकिन कल किसी दूसरे परिवार के सामने यही सवाल खड़ा होगा कि उसके पालतू जीव की मृत्यु के बाद वह उसे सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई कहां और कैसे दे?
मृत्यु शाश्वत सत्य है—चाहे वह इंसान की हो या किसी बेजुबान जीव की। जरूरत इस बात की है कि कानून और व्यवस्था के साथ इंसानियत भी जीवित रहे। बिलासपुर की यह घटना शायद इसी संवेदना और व्यवस्था पर नए सिरे से सोचने का अवसर दे रही है।