कविता: ..और वतन पर जां लुटाना इश्क़ है

• डॉ. रश्मि दुबे,गाजियाबाद

उसने पूछा क्या बला ये है इश्क़ है
है बुरा या फिर भला ये इश्क़ है

गोद में मां की हो बालक यूं पड़ा
मिल गया जैसे ख़जाना इश्क़ है

चल पकड़ कर हाथ अपने पितृ का
देश दुनिया का घुमाना इश्क़ है

एक राखी जो बंधी हो हाथ में
मरके भी वादा निभाना इश्क़ है

जब पड़ी हो बात ही परिवार पर
दांव पर खुद को लगाना इश्क़ है

दिल दिया जिसको भी तुमने इश्क़ में
उसकी खुशियों को बचाना इश्क़ है

देश पर मरने का ज़ज़्बा दिल में हो
और वतन पर जां लुटाना इश्क़ है

भेजकर सरहद पर अपने पुत्र को
गर्व से फिर मुस्कुराना इश्क़ है

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